॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.18.37
न हि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता।
आदेहान्तात् क्वचित् ख्यातिस्ततः सम्पद्यते मया॥ ३७
na hi tasya vikalpākhyā yā ca madvīkṣayā hatā|
ādehāntāt kvacit khyātistataḥ sampadyate mayā|| 37
अर्थ
क्योंकि ज्ञाननिष्ठ पुरुषको भेदकी प्रतीति ही नहीं होती। जो पहले थी, वह भी मुझ सर्वात्माके साक्षात्कारसे नष्ट हो गयी। यदि कभी-कभी मरणपर्यन्त बाधित भेदकी प्रतीति भी होती है, तब भी देहपात हो जानेपर वह मुझसे एक हो जाता है॥ ३७॥