श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.39

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तावत् परिचरेद् भक्तः श्रद्धावाननसूयकः।

यावद् ब्रह्म विजानीयान्मामेव गुरुमादृतः॥ ३९

tāvat paricared bhaktaḥ śraddhāvānanasūyakaḥ|

yāvad brahma vijānīyānmāmeva gurumādṛtaḥ|| 39

अर्थ

वह गुरुकी दृढ़ भक्ति करे, श्रद्धा रखे और उनमें दोष कभी न निकाले। जबतक ब्रह्मका ज्ञान हो, तबतक बड़े आदरसे मुझे ही गुरुके रूपमें समझता हुआ उनकी सेवा करे॥ ३९॥

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