श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ग्रीष्मे तप्येत पंचा‌ग्‍नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।

आकण्ठम‌ग्‍नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्‍चरेत्॥ ४

grīṣme tapyeta paṃcāgnīn varṣāsvāsāraṣāḍ jale|

ākaṇṭhamagnaḥ śiśire evaṃvṛttastapaścaret|| 4

अर्थ

ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्‍नि तपे, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें रहकर वर्षाकी बौछार सहे। जाड़ेके दिनोंमें गलेतक जलमें डूबा रहे। इस प्रकार घोर तपस्यामय जीवन व्यतीत करे॥ ४॥

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