॥ श्रीहरिः ॥
ग्रीष्मे तप्येत पंचाग्नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।
आकण्ठमग्नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्चरेत्॥ ४
grīṣme tapyeta paṃcāgnīn varṣāsvāsāraṣāḍ jale|
ākaṇṭhamagnaḥ śiśire evaṃvṛttastapaścaret|| 4
अर्थ
ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्नि तपे, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें रहकर वर्षाकी बौछार सहे। जाड़ेके दिनोंमें गलेतक जलमें डूबा रहे। इस प्रकार घोर तपस्यामय जीवन व्यतीत करे॥ ४॥
ग्रीष्मे तप्येत पंचाग्नीन् वर्षास्वासारषाड् जले।
आकण्ठमग्नः शिशिरे एवंवृत्तस्तपश्चरेत्॥ ४
ग्रीष्म ऋतुमें पंचाग्नि तपे, वर्षा ऋतुमें खुले मैदानमें रहकर वर्षाकी बौछार सहे। जाड़ेके दिनोंमें गलेतक जलमें डूबा रहे। इस प्रकार घोर तपस्यामय जीवन व्यतीत करे॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.18.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 821) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/18/4/