श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत्।

स्थित्युत्पत्त्यप्ययान् पश्येद् भावानां त्रिगुणात्मनाम्॥ १५

etadeva hi vijñānaṃ na tathaikena yena yat|

sthityutpattyapyayān paśyed bhāvānāṃ triguṇātmanām|| 15

अर्थ

जब जिस एक तत्त्वसे अनुगत एकात्मक तत्त्वोंको पहले देखता था, उनको पहलेके समान न देखे, किन्तु एक परम कारण ब्रह्मको ही देखे, तब यही निश्‍चित विज्ञान (अपरोक्षज्ञान) कहा जाता है। (इस ज्ञान और विज्ञानको प्राप्त करनेकी युक्ति यह है कि) यह शरीर आदि जितने भी त्रिगुणात्मक सावयव पदार्थ हैं, उनकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयका विचार करे॥ १५॥✎ 1753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1753 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-तन्मात्रा—ये → पंचतन्मात्रा—ये

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