॥ श्रीहरिः ॥
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः॥ २१
ādaraḥ paricaryāyāṃ sarvāṅgairabhivandanam|
madbhaktapūjābhyadhikā sarvabhūteṣu manmatiḥ|| 21
अर्थ
मेरी सेवा-पूजामें प्रेम रखे और सामने साष्टांग लोटकर प्रणाम करे; मेरे भक्तोंकी पूजा मेरी पूजासे बढ़कर करे और समस्त प्राणियोंमें मुझे ही देखे॥ २१॥
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः॥ २१
मेरी सेवा-पूजामें प्रेम रखे और सामने साष्टांग लोटकर प्रणाम करे; मेरे भक्तोंकी पूजा मेरी पूजासे बढ़कर करे और समस्त प्राणियोंमें मुझे ही देखे॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 830) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/19/21/