श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

मदर्थेऽर्थपरित्यागो भोगस्य च सुखस्य च।

इष्टं दत्तं हुतं जप्तं मदर्थं यद् व्रतं तपः॥ २३

madarthe'rthaparityāgo bhogasya ca sukhasya ca|

iṣṭaṃ dattaṃ hutaṃ japtaṃ madarthaṃ yad vrataṃ tapaḥ|| 23

अर्थ

मेरे लिये धन, भोग और प्राप्त सुखका भी परित्याग कर दे और जो कुछ यज्ञ, दान, हवन, जप, व्रत और तप किया जाय, वह सब मेरे लिये ही करे॥ २३॥

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