॥ श्रीहरिः ॥
कः पण्डितः कश्च मूर्खः कः पन्था उत्पथश्च कः।
कः स्वर्गो नरकः कः स्वित् को बन्धुरुत किं गृहम्॥ ३१
kaḥ paṇḍitaḥ kaśca mūrkhaḥ kaḥ panthā utpathaśca kaḥ|
kaḥ svargo narakaḥ kaḥ svit ko bandhuruta kiṃ gṛham|| 31
अर्थ
पण्डित और मूर्खके लक्षण क्या हैं? सुमार्ग और कुमार्गका क्या लक्षण है? स्वर्ग और नरक क्या हैं? भाई-बन्धु किसे मानना चाहिये? और घर क्या है?॥ ३१॥
कः पण्डितः कश्च मूर्खः कः पन्था उत्पथश्च कः।
कः स्वर्गो नरकः कः स्वित् को बन्धुरुत किं गृहम्॥ ३१
पण्डित और मूर्खके लक्षण क्या हैं? सुमार्ग और कुमार्गका क्या लक्षण है? स्वर्ग और नरक क्या हैं? भाई-बन्धु किसे मानना चाहिये? और घर क्या है?॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 831) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/19/31/