श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

शौचं जपस्तपो होमः श्रद्धाऽऽतिथ्यं मदर्चनम्।

तीर्थाटनं परार्थेहा तुष्टिराचार्यसेवनम्॥ ३४

śaucaṃ japastapo homaḥ śraddhā''tithyaṃ madarcanam|

tīrthāṭanaṃ parārthehā tuṣṭirācāryasevanam|| 34

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—‘यम’ बारह हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), असंगता, लज्जा, असंचय (आवश्यकतासे अधिक धन आदि न जोड़ना), आस्तिकता, ब्रह्मचर्य, मौन, स्थिरता, क्षमा और अभय। नियमोंकी संख्या भी बारह ही हैं। शौच (बाहरी पवित्रता और भीतरी पवित्रता), जप, तप, हवन, श्रद्धा, अतिथिसेवा, मेरी पूजा, तीर्थयात्रा, परोपकारकी चेष्टा, सन्तोष और गुरुसेवा—इस प्रकार ‘यम’ और ‘नियम’ दोनोंकी संख्या बारह-बारह हैं। ये सकाम और निष्काम दोनों प्रकारके साधकोंके लिये उपयोगी हैं। उद्धवजी! जो पुरुष इनका पालन करते हैं, वे यम और नियम उनके इच्छानुसार उन्हें भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं॥ ३३—३५॥

यह अर्थ श्लोक 33–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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