svabhāvavijayaḥ śauryaṃ satyaṃ ca samadarśanam|| 37
अर्थ
किसीसे द्रोह न करना सबको अभय देना ‘दान’ है। कामनाओंका त्याग करना ही ‘तप’ है। अपनी वासनाओंपर विजय प्राप्त करना ही ‘शूरता’ है। सर्वत्र समस्वरूप, सत्यस्वरूप परमात्माका दर्शन ही ‘सत्य’ है॥ ३७॥
दण्डन्यासः परं दानं कामत्यागस्तपः स्मृतम्।
स्वभावविजयः शौर्यं सत्यं च समदर्शनम्॥ ३७
किसीसे द्रोह न करना सबको अभय देना ‘दान’ है। कामनाओंका त्याग करना ही ‘तप’ है। अपनी वासनाओंपर विजय प्राप्त करना ही ‘शूरता’ है। सर्वत्र समस्वरूप, सत्यस्वरूप परमात्माका दर्शन ही ‘सत्य’ है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 832) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/19/37/