श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

दण्डन्यासः परं दानं कामत्यागस्तपः स्मृतम्।

स्वभावविजयः शौर्यं सत्यं च समदर्शनम्॥ ३७

daṇḍanyāsaḥ paraṃ dānaṃ kāmatyāgastapaḥ smṛtam|

svabhāvavijayaḥ śauryaṃ satyaṃ ca samadarśanam|| 37

अर्थ

किसीसे द्रोह न करना सबको अभय देना ‘दान’ है। कामनाओंका त्याग करना ही ‘तप’ है। अपनी वासनाओंपर विजय प्राप्त करना ही ‘शूरता’ है। सर्वत्र समस्वरूप, सत्यस्वरूप परमात्माका दर्शन ही ‘सत्य’ है॥ ३७॥

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