धर्म ही मनुष्योंका अभीष्ट ‘धन’ है। मैं परमेश्वर ही ‘यज्ञ’ हूँ। ज्ञानका उपदेश देना ही ‘दक्षिणा’ है। प्राणायाम ही श्रेष्ठ ‘बल’ है॥ ३९॥
धर्म इष्टं धनं नॄणां यज्ञोऽहं भगवत्तमः।
दक्षिणा ज्ञानसन्देशः प्राणायामः परं बलम्॥ ३९
धर्म ही मनुष्योंका अभीष्ट ‘धन’ है। मैं परमेश्वर ही ‘यज्ञ’ हूँ। ज्ञानका उपदेश देना ही ‘दक्षिणा’ है। प्राणायाम ही श्रेष्ठ ‘बल’ है॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 832) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/19/39/