श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तपस्तीर्थं जपो दानं पवित्राणीतराणि च।

नालं कुर्वन्ति तां सिद्धिं या ज्ञानकलया कृता॥ ४

tapastīrthaṃ japo dānaṃ pavitrāṇītarāṇi ca|

nālaṃ kurvanti tāṃ siddhiṃ yā jñānakalayā kṛtā|| 4

अर्थ

तत्त्वज्ञानके लेशमात्रका उदय होनेसे जो सिद्धि प्राप्त होती है, वह तपस्या, तीर्थ, जप, दान अथवा अन्तःकरणशुद्धिके और किसी भी साधनसे पूर्णतया नहीं हो सकती॥ ४॥

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