॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.19.41
श्रीर्गुणा नैरपेक्ष्याद्याः सुखं दुःखसुखात्ययः।
दुःखं कामसुखापेक्षा पण्डितो बन्धमोक्षवित्॥ ४१
śrīrguṇā nairapekṣyādyāḥ sukhaṃ duḥkhasukhātyayaḥ|
duḥkhaṃ kāmasukhāpekṣā paṇḍito bandhamokṣavit|| 41
अर्थ
निरपेक्षता आदि गुण ही शरीरका सच्चा सौन्दर्य—‘श्री’ है, दुःख और सुख दोनोंकी भावनाका सदाके लिये नष्ट हो जाना ही ‘सुख’ है। विषयभोगोंकी कामना ही ‘दुःख’ है। जो बन्धन और मोक्षका तत्त्व जानता है, वही ‘पण्डित’ है॥ ४१॥