वे इस कार्य-कारण और व्यक्त-अव्यक्त भगवद्रूप जगत्को अपने आत्मासे अभिन्न अनुभव करते हुए पृथ्वीपर स्वच्छन्द विचरण करते थे॥ २२॥✎ 17241725
त एते भगवद्रूपं विश्वं सदसदात्मकम्।
आत्मनोऽव्यतिरेकेण पश्यन्तो व्यचरन् महीम्॥ २२
वे इस कार्य-कारण और व्यक्त-अव्यक्त भगवद्रूप जगत्को अपने आत्मासे अभिन्न अनुभव करते हुए पृथ्वीपर स्वच्छन्द विचरण करते थे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 715) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/2/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)