श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

त एते भगवद्रूपं विश्‍वं सदसदात्मकम्।

आत्मनोऽव्यतिरेकेण पश्यन्तो व्यचरन् महीम्॥ २२

ta ete bhagavadrūpaṃ viśvaṃ sadasadātmakam|

ātmano'vyatirekeṇa paśyanto vyacaran mahīm|| 22

अर्थ

वे इस कार्य-कारण और व्यक्त-अव्यक्त भगवद्रूप जगत‍्को अपने आत्मासे अभिन्‍न अनुभव करते हुए पृथ्वीपर स्वच्छन्द विचरण करते थे॥ २२॥✎ 1724 1725

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1724 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कर-भाजन॥ → करभाजन॥
  • #1725 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज्य-भोग → राज्यभोग

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