श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

धर्मान् भागवतान् ब्रूत यदि नः श्रुतये क्षमम्।

यैः प्रसन्‍नः प्रपन्‍नाय दास्यत्यात्मानमप्यजः॥ ३१

dharmān bhāgavatān brūta yadi naḥ śrutaye kṣamam|

yaiḥ prasannaḥ prapannāya dāsyatyātmānamapyajaḥ|| 31

अर्थ

योगीश्‍वरो! यदि हम सुननेके अधिकारी हों तो आप कृपा करके भागवत-धर्मोंका उपदेश कीजिये; क्योंकि उनसे जन्मादि विकारसे रहित, एकरस भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्‍न होते हैं और उन धर्मोंका पालन करनेवाले शरणागत भक्तोंको अपने-आपतकका दान कर डालते हैं॥ ३१॥

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