जो भगवान्से प्रेम, उनके भक्तोंसे मित्रता, दुःखी और अज्ञानियोंपर कृपा तथा भगवान्से द्वेष करनेवालोंकी उपेक्षा करता है, वह मध्यम कोटिका भागवत है॥ ४६॥✎ 900901
ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च।
प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥ ४६
जो भगवान्से प्रेम, उनके भक्तोंसे मित्रता, दुःखी और अज्ञानियोंपर कृपा तथा भगवान्से द्वेष करनेवालोंकी उपेक्षा करता है, वह मध्यम कोटिका भागवत है॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.2.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 720) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/2/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)