श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.51

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

न यस्य जन्मकर्मभ्यां न वर्णाश्रमजातिभिः।

सज्जतेऽस्मिन्‍नहंभावो देहे वै स हरेः प्रियः॥ ५१

na yasya janmakarmabhyāṃ na varṇāśramajātibhiḥ|

sajjate'sminnahaṃbhāvo dehe vai sa hareḥ priyaḥ|| 51

अर्थ

जिनका इस शरीरमें न तो सत्कुलमें जन्म, तपस्या आदि कर्मसे तथा न वर्ण, आश्रम एवं जातिसे ही अहंभाव होता है, वह निश्‍चय ही भगवान्‌का प्यारा है॥ ५१॥

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