श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

अहोरात्रैश्छिद्यमानं बुद‍्ध्वाऽऽयुर्भयवेपथुः।

मुक्तसंगः परं बुद‍्ध्वा निरीह उपशाम्यति॥ १६

ahorātraiśchidyamānaṃ buddhvā''yurbhayavepathuḥ|

muktasaṃgaḥ paraṃ buddhvā nirīha upaśāmyati|| 16

अर्थ

प्रिय उद्धव! ये दिन और रात क्षण-क्षणमें शरीरकी आयुको क्षीण कर रहे हैं। यह जानकर जो भयसे काँप उठता है, वह व्यक्ति इसमें आसक्ति छोड़कर परमतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लेता है और फिर इसके जीवन-मरणसे निरपेक्ष होकर अपने आत्मामें ही शान्त हो जाता है॥ १६॥

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