श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

धार्यमाणं मनो यर्हि भ्राम्यदाश्‍वनवस्थितम्।

अतन्द्रितोऽनुरोधेन मार्गेणात्मवशं नयेत्॥ १९

dhāryamāṇaṃ mano yarhi bhrāmyadāśvanavasthitam|

atandrito'nurodhena mārgeṇātmavaśaṃ nayet|| 19

अर्थ

जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर-उधर भटकने लगे, तब झटपट बड़ी सावधानीसे उसे मनाकर, समझा-बुझाकर, फुसलाकर अपने वशमें कर ले॥ १९॥✎ 1754

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1754 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्ति-योगसे → भक्तियोगसे

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