श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

एष वै परमो योगो मनसः संग्रहः स्मृतः।

हृदयज्ञत्वमन्विच्छन् दम्यस्येवार्वतो मुहुः॥ २१

eṣa vai paramo yogo manasaḥ saṃgrahaḥ smṛtaḥ|

hṛdayajñatvamanvicchan damyasyevārvato muhuḥ|| 21

अर्थ

जैसे सवार घोड़ेको अपने वशमें करते समय उसे अपने मनो-भावकी पहचान कराना चाहता है—अपनी इच्छाके अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार-बार फुसलाकर उसे अपने वशमें कर लेता है, वैसे ही मनको फुसलाकर, उसे मीठी-मीठी बातें सुनाकर वशमें कर लेना भी परम योग है॥ २१॥✎ 1754

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1754 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्ति-योगसे → भक्तियोगसे

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