श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.20.24

एकादश स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

यमादिभिर्योगपथैरान्वीक्षिक्या च विद्यया।

ममार्चोपासनाभिर्वा नान्यैर्योग्यं स्मरेन्मनः॥ २४

yamādibhiryogapathairānvīkṣikyā ca vidyayā|

mamārcopāsanābhirvā nānyairyogyaṃ smarenmanaḥ|| 24

अर्थ

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि आदि योगमार्गोंसे, वस्तुतत्त्वका निरीक्षण-परीक्षण करनेवाली आत्मविद्यासे तथा मेरी प्रतिमाकी उपासनासे—अर्थात् कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोगसे मन परमात्माका चिन्तन करने लगता है; और कोई उपाय नहीं है॥ २४॥✎ 1754

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1754 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्ति-योगसे → भक्तियोगसे

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