भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! मेरी प्राप्तिके तीन मार्ग हैं—भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग। जो इन्हें छोड़कर चंचल इन्द्रियोंके द्वारा क्षुद्र भोग भोगते रहते हैं, वे बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करमें भटकते रहते हैं॥ १॥✎ 17561757
य एतान् मत्पथो हित्वा भक्तिज्ञानक्रियात्मकान्।
क्षुद्रान् कामांश्चलैः प्राणैर्जुषन्तः संसरन्ति ते॥ १
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! मेरी प्राप्तिके तीन मार्ग हैं—भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग। जो इन्हें छोड़कर चंचल इन्द्रियोंके द्वारा क्षुद्र भोग भोगते रहते हैं, वे बार-बार जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्करमें भटकते रहते हैं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.21.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 839) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/21/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)