॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.21.14
स्नानदानतपोऽवस्थावीर्यसंस्कारकर्मभिः।
मत्स्मृत्या चात्मनः शौचं शुद्धः कर्माचरेद् द्विजः॥ १४
snānadānatapo'vasthāvīryasaṃskārakarmabhiḥ|
matsmṛtyā cātmanaḥ śaucaṃ śuddhaḥ karmācared dvijaḥ|| 14
अर्थ
स्नान, दान, तपस्या, वय, सामर्थ्य, संस्कार, कर्म और मेरे स्मरणसे चित्तकी शुद्धि होती है। इनके द्वारा शुद्ध होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको विहित कर्मोंका आचरण करना चाहिये॥ १४॥