इसमें सन्देह नहीं कि संसारके विषय-भोगोंमें, प्राणोंमें और सगे-सम्बन्धियोंमें सभी मनुष्य जन्मसे ही आसक्त हैं और उन वस्तुओंकी आसक्ति उनकी आत्मोन्नतिमें बाधक एवं अनर्थका कारण है॥ २४॥✎ 1759
उत्पत्त्यैव हि कामेषु प्राणेषु स्वजनेषु च।
आसक्तमनसो मर्त्या आत्मनोऽनर्थहेतुषु॥ २४
इसमें सन्देह नहीं कि संसारके विषय-भोगोंमें, प्राणोंमें और सगे-सम्बन्धियोंमें सभी मनुष्य जन्मसे ही आसक्त हैं और उन वस्तुओंकी आसक्ति उनकी आत्मोन्नतिमें बाधक एवं अनर्थका कारण है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.21.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 842) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/21/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)