॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.21.28
न ते मामंग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।
उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८
na te māmaṃga jānanti hṛdisthaṃ ya idaṃ yataḥ|
ukthaśastrā hyasutṛpo yathā nīhāracakṣuṣaḥ|| 28
अर्थ
प्यारे उद्धव! उनके पास साधना है तो केवल कर्मकी और उसका कोई फल है तो इन्द्रियोंकी तृप्ति। उनकी आँखें धुँधली हो गयी हैं; इसीसे वे यह बात नहीं जानते कि जिससे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं इस जगत्के रूपमें है, वह परमात्मा मैं उनके हृदयमें ही हूँ॥ २८॥✎ 1759