श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

न ते मामंग जानन्ति हृदिस्थं य इदं यतः।

उक्थशस्त्रा ह्यसुतृपो यथा नीहारचक्षुषः॥ २८

na te māmaṃga jānanti hṛdisthaṃ ya idaṃ yataḥ|

ukthaśastrā hyasutṛpo yathā nīhāracakṣuṣaḥ|| 28

अर्थ

प्यारे उद्धव! उनके पास साधना है तो केवल कर्मकी और उसका कोई फल है तो इन्द्रियोंकी तृप्ति। उनकी आँखें धुँधली हो गयी हैं; इसीसे वे यह बात नहीं जानते कि जिससे इस जगत‍्की उत्पत्ति हुई है, जो स्वयं इस जगत‍्के रूपमें है, वह परमात्मा मैं उनके हृदयमें ही हूँ॥ २८॥✎ 1759

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1759 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वाली → करनेवाली

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