श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

स्वप्नोपमममुं लोकमसन्तं श्रवणप्रियम्।

आशिषो हृदि संकल्प्य त्यजन्त्यर्थान् यथा वणिक्॥ ३१

svapnopamamamuṃ lokamasantaṃ śravaṇapriyam|

āśiṣo hṛdi saṃkalpya tyajantyarthān yathā vaṇik|| 31

अर्थ

उद्धवजी! स्वर्गादि परलोक स्वप्नके दृश्योंके समान हैं, वास्तवमें वे असत् हैं, केवल उनकी बातें सुननेमें बहुत मीठी लगती हैं। सकाम पुरुष वहाँके भोगोंके लिये मन-ही-मन अनेकों प्रकारके संकल्प कर लेते हैं और जैसे व्यापारी अधिक लाभकी आशासे मूलधनको भी खो बैठता है, वैसे ही वे सकाम यज्ञोंद्वारा अपने धनका नाश करते हैं॥ ३१॥

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