श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

वेदा ब्रह्मात्मविषयास्त्रिकाण्डविषया इमे।

परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम्॥ ३५

vedā brahmātmaviṣayāstrikāṇḍaviṣayā ime|

parokṣavādā ṛṣayaḥ parokṣaṃ mama ca priyam|| 35

अर्थ

उद्धवजी! वेदोंमें तीन काण्ड हैं—कर्म, उपासना और ज्ञान। इन तीनों काण्डोंके द्वारा प्रतिपादित विषय है ब्रह्म और आत्माकी एकता, सभी मन्त्र और मन्त्रद्रष्टा ऋषि इस विषयको खोलकर नहीं, गुप्तभावसे बतलाते हैं और मुझे भी इस बातको गुप्तरूपसे कहना ही अभीष्ट है*॥ ३५॥✎ 1760 1761 1937 1990

टिप्पणियाँ

  1. *

    क्योंकि सब लोग इसके अधिकारी नहीं हैं, अन्तःकरण शुद्ध होनेपर ही यह बात समझमें आती है।

    (मुद्रित पृष्ठ 844)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1760 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनन्त-शक्ति-सम्पन्‍न → अनन्त-शक्तिसम्पन्‍न
  • #1761 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मन्त्र-द्रष्टा → मन्त्रद्रष्टा
  • #1937 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): अनन्त-शक्ति → अनन्तशक्ति
  • #1990 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मूर्त्ति → मूर्ति

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें