श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

देशकालादिभावानां वस्तूनां मम सत्तम।

गुणदोषौ विधीयेते नियमार्थं हि कर्मणाम्॥ ७

deśakālādibhāvānāṃ vastūnāṃ mama sattama|

guṇadoṣau vidhīyete niyamārthaṃ hi karmaṇām|| 7

अर्थ

साधुश्रेष्ठ! देश, काल, फल, निमित्त, अधिकारी और धान्य आदि वस्तुओंके गुण-दोषोंका विधान भी मेरे द्वारा इसीलिये किया गया है कि कर्मोंमें लोगोंकी उच्छृंखल प्रवृत्ति न हो, मर्यादाका भंग न होने पावे॥ ७॥✎ 1756 1757

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1756 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-योग्य → करनेयोग्य
  • #1757 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-भूत → पंचभूत

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