श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

कर्मण्यो गुणवान् कालो द्रव्यतः स्वत एव वा।

यतो निवर्तते कर्म स दोषोऽकर्मकः स्मृतः॥ ९

karmaṇyo guṇavān kālo dravyataḥ svata eva vā|

yato nivartate karma sa doṣo'karmakaḥ smṛtaḥ|| 9

अर्थ

समय वही पवित्र है, जिसमें कर्म करनेयोग्य सामग्री मिल सके तथा कर्म भी हो सके। जिसमें कर्म करनेकी सामग्री न मिले, आगन्तुक दोषोंसे अथवा स्वाभाविक दोषके कारण जिसमें कर्म ही न हो सके, वह समय अशुद्ध है॥ ९॥✎ 1756 1757

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1756 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-योग्य → करनेयोग्य
  • #1757 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-भूत → पंचभूत

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