श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम्।

स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत्॥ १०

anādyavidyāyuktasya puruṣasyātmavedanam|

svato na sambhavādanyastattvajño jñānado bhavet|| 10

अर्थ

उद्धवजी! जिन लोगोंने छब्बीस संख्या स्वीकार की है, वे ऐसा कहते हैं कि जीव अनादि कालसे अविद्यासे ग्रस्त हो रहा है। वह स्वयं अपने-आपको नहीं जान सकता। उसे आत्मज्ञान करानेके लिये किसी अन्य सर्वज्ञकी आवश्यकता है। (इसलिये प्रकृतिके कार्यकारणरूप चौबीस तत्त्व, पचीसवाँ पुरुष और छब्बीसवाँ ईश्‍वर—इस प्रकार कुल छब्बीस तत्त्व स्वीकार करने चाहिये)॥ १०॥✎ 1763

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1763 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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