श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते।

गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च॥ १३

sattvaṃ jñānaṃ rajaḥ karma tamo'jñānamihocyate|

guṇavyatikaraḥ kālaḥ svabhāvaḥ sūtrameva ca|| 13

अर्थ

इस प्रसंगमें सत्त्वगुण ही ज्ञान है, रजोगुण ही कर्म है और तमोगुण ही अज्ञान कहा गया है। और गुणोंमें क्षोभ उत्पन्‍न करनेवाला ईश्‍वर ही काल है और सूत्र अर्थात् महत्तत्त्व ही स्वभाव है। (इसलिये पचीस और छब्बीस तत्त्वोंकी—दोनों ही संख्या युक्तिसंगत है)॥ १३॥✎ 1763

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1763 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मानने-वाले → माननेवाले

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