श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

सर्गादौ प्रकृतिर्ह्यस्य कार्यकारणरूपिणी।

सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोऽव्यक्त ईक्षते॥ १७

sargādau prakṛtirhyasya kāryakāraṇarūpiṇī|

sattvādibhirguṇairdhatte puruṣo'vyakta īkṣate|| 17

अर्थ

सृष्टिके आरम्भमें कार्य (ग्यारह इन्द्रिय और पंचभूत) और कारण (महत्तत्त्व आदि) के रूपमें प्रकृति ही रहती है। वही सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणकी सहायतासे जगत‍्की स्थिति, उत्पत्ति और संहारसम्बन्धी अवस्थाएँ धारण करती है। अव्यक्त पुरुष तो प्रकृति और उसकी अवस्थाओंका केवल साक्षीमात्र बना रहता है॥ १७॥

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