श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

इति नानाप्रसंख्यानं तत्त्वानामृषिभिः कृतम्।

सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम्॥ २५

iti nānāprasaṃkhyānaṃ tattvānāmṛṣibhiḥ kṛtam|

sarvaṃ nyāyyaṃ yuktimattvād viduṣāṃ kimaśobhanam|| 25

अर्थ

उद्धवजी! इस प्रकार ऋषि-मुनियोंने भिन्‍न-भिन्‍न प्रकारसे तत्त्वोंकी गणना की है। सबका कहना उचित ही है, क्योंकि सबकी संख्या युक्तियुक्त है। जो लोग तत्त्वज्ञानी हैं, उन्हें किसी भी मतमें बुराई नहीं दीखती। उनके लिये तो सब कुछ ठीक ही है॥ २५॥

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