श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

दृग् रूपमार्कं वपुरत्र रन्ध्रे

परस्परं सिध्यति यः स्वतः खे।

आत्मा यदेषामपरो य आद्यः

स्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धिः ।

एवं त्वगादि श्रवणादि चक्षु-

र्जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम्॥ ३१

dṛg rūpamārkaṃ vapuratra randhre

parasparaṃ sidhyati yaḥ svataḥ khe|

ātmā yadeṣāmaparo ya ādyaḥ

svayānubhūtyākhilasiddhasiddhiḥ |

evaṃ tvagādi śravaṇādi cakṣu-

rjihvādi nāsādi ca cittayuktam|| 31

अर्थ

उदाहरणार्थ—नेत्रेन्द्रिय अध्यात्म है, उसका विषय रूप अधिभूत है और नेत्र-गोलकमें स्थित सूर्यदेवताका अंश अधिदैव है। ये तीनों परस्पर एक-दूसरेके आश्रयसे सिद्ध होते हैं। और इसलिये अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत—ये तीनों ही परस्पर सापेक्ष हैं। परन्तु आकाशमें स्थित सूर्यमण्डल इन तीनोंकी अपेक्षासे मुक्त है, क्योंकि वह स्वतःसिद्ध है। इसी प्रकार आत्मा भी उपर्युक्त तीनों भेदोंका मूलकारण, उनका साक्षी और उनसे परे है। वही अपने स्वयंसिद्ध प्रकाशसे समस्त सिद्ध पदार्थोंकी मूलसिद्धि है। उसीके द्वारा सबका प्रकाश होता है। जिस प्रकार चक्षुके तीन भेद बताये गये, उसी प्रकार त्वचा, श्रोत्र, जिह्वा, नासिका और चित्त आदिके भी तीन-तीन भेद हैं*॥ ३१॥✎ 1451

टिप्पणियाँ

  1. *

    यथा—त्वचा, स्पर्श और वायु; श्रवण, शब्द और दिशा; जिह्वा, रस और वरुण; नासिका, गन्ध और अश्‍विनीकुमार; चित्त, चिन्तनका विषय और वासुदेव; मन, मनका विषय और चन्द्रमा; अहंकार, अहंकारका विषय और रुद्र; बुद्धि, समझनेका विषय और ब्रह्मा—इन सभी त्रिविध तत्त्वोंसे आत्माका कोई सम्बन्ध नहीं है।

    (मुद्रित पृष्ठ 850)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1451 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृद्धि-ह्रस → वृद्धि-ह्रास

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