श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.33

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

आत्मा परिज्ञानमयो विवादो

ह्यस्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठः।

व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां ✎ 2176

मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३✎ 2176

ātmā parijñānamayo vivādo

hyastīti nāstīti bhidārthaniṣṭhaḥ|

vyartho'pi naivoparameta puṃsāṃ

mattaḥ parāvṛttadhiyāṃ svalokāt|| 33

अर्थ

आत्मा ज्ञानस्वरूप है; उसका इन पदार्थोंसे न तो कोई सम्बन्ध है और न उसमें कोई विवादकी ही बात है! अस्ति-नास्ति (है-नहीं), सगुण-निर्गुण, भाव-अभाव, सत्य-मिथ्या आदि रूपसे जितने भी वाद-विवाद हैं, सबका मूलकारण भेददृष्टि ही है। इसमें सन्देह नहीं कि इस विवादका कोई प्रयोजन नहीं है; यह सर्वथा व्यर्थ है तथापि जो लोग मुझसे—अपने वास्तविक स्वरूपसे विमुख हैं, वे इस विवादसे मुक्त नहीं हो सकते॥ ३३॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2176 छूटा या अधिक पाठ: व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः / परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३ → व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां / मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात्॥ ३३

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