श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

मनः कर्ममयं नॄणामिन्द्रियैः पंचभिर्युतम्।✎ 1228

लोकाल्लोकं प्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते॥ ३६

manaḥ karmamayaṃ nṝṇāmindriyaiḥ paṃcabhiryutam|

lokāllokaṃ prayātyanya ātmā tadanuvartate|| 36

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! मनुष्योंका मन कर्म-संस्कारोंका पुंज है। उन संस्कारोंके अनुसार भोग प्राप्त करनेके लिये उसके साथ पाँच इन्द्रियाँ भी लगी हुई हैं। इसीका नाम है लिंगशरीर। वही कर्मोंके अनुसार एक शरीरसे दूसरे शरीरमें, एक लोकसे दूसरे लोकमें आता-जाता रहता है। आत्मा इस लिंगशरीरसे सर्वथा पृथक् है। उसका आना-जाना नहीं होता; परन्तु जब वह अपनेको लिंगशरीर ही समझ बैठता है, उसीमें अहंकार कर लेता है, तब उसे भी अपना जाना-आना प्रतीत होने लगता है॥ ३६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1228 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नृणामिन्द्रियै: → नॄणामिन्द्रियैः

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