श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.38

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत् स्मरेत् पुनः।

जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः॥ ३८

viṣayābhiniveśena nātmānaṃ yat smaret punaḥ|

jantorvai kasyaciddhetormṛtyuratyantavismṛtiḥ|| 38

अर्थ

उन देवादि शरीरोंमें इसका इतना अभिनिवेश, इतनी तल्लीनता हो जाती है कि जीवको अपने पूर्व शरीरका स्मरण भी नहीं रहता। किसी भी कारणसे शरीरको सर्वथा भूल जाना ही मृत्यु है॥ ३८॥

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