॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.41
इन्द्रियायनसृष्ट्येदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि।
बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा॥ ४१
indriyāyanasṛṣṭyedaṃ traividhyaṃ bhāti vastuni|
bahirantarbhidāheturjano'sajjanakṛd yathā|| 41
अर्थ
इन्द्रियोंके आश्रय मन या शरीरकी सृष्टिसे आत्मवस्तुमें यह उत्तम, मध्यम और अधमकी त्रिविधता भासती है। उनमें अभिमान करनेसे ही आत्मा बाह्य और आभ्यन्तर भेदोंका हेतु मालूम पड़ने लगता है, जैसे दुष्ट पुत्रको उत्पन्न करनेवाला पिता पुत्रके शत्रु-मित्र आदिके लिये भेदका हेतु हो जाता है॥ ४१॥