॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.45
मा स्वस्य कर्मबीजेन जायते सोऽप्ययं पुमान्।
म्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्निर्दारुसंयुतः॥ ४५
mā svasya karmabījena jāyate so'pyayaṃ pumān|
mriyate vāmaro bhrāntyā yathāgnirdārusaṃyutaḥ|| 45
अर्थ
यद्यपि वह भ्रान्त पुरुष भी अपने कर्मोंके बीजद्वारा न पैदा होता है और न तो मरता ही है; वह भी अजन्मा और अमर ही है, फिर भी भ्रान्तिसे वह उत्पन्न होता है और मरता-सा भी है, जैसे कि काष्ठसे युक्त अग्नि पैदा होता और नष्ट होता दिखायी पड़ता है॥ ४५॥