यह शरीर जीवसे भिन्न है और ये ऊँची-नीची अवस्थाएँ उसके मनोरथके अनुसार ही हैं; परन्तु वह अज्ञानवश गुणोंके संगसे इन्हें अपनी मानकर भटकने लगता है और कभी-कभी विवेक हो जानेपर इन्हें छोड़ भी देता है॥ ४७॥
एता मनोरथमयीर्ह्यन्यस्योच्चावचास्तनूः।
गुणसंगादुपादत्ते क्वचित् कश्चिज्जहाति च॥ ४७
यह शरीर जीवसे भिन्न है और ये ऊँची-नीची अवस्थाएँ उसके मनोरथके अनुसार ही हैं; परन्तु वह अज्ञानवश गुणोंके संगसे इन्हें अपनी मानकर भटकने लगता है और कभी-कभी विवेक हो जानेपर इन्हें छोड़ भी देता है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.22.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 853) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/22/47/