॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.55
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते।
ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा॥ ५५
arthe hyavidyamāne'pi saṃsṛtirna nivartate|
dhyāyato viṣayānasya svapne'narthāgamo yathā|| 55
अर्थ
विषयोंके सत्य न होनेपर भी जो जीव विषयोंका ही चिन्तन करता रहता है, उसका यह जन्म-मृत्युरूप संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं होता, जैसे स्वप्नमें प्राप्त अनर्थ-परम्परा जागे बिना निवृत्त नहीं होती॥ ५५॥