श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

यशो यशस्विनां शुद्धं श्‍लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।

लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्‍वित्रो रूपमिवेप्सितम्॥ १६

yaśo yaśasvināṃ śuddhaṃ ślāghyā ye guṇināṃ guṇāḥ|

lobhaḥ svalpo'pi tān hanti śvitro rūpamivepsitam|| 16

अर्थ

जैसे थोड़ा-सा भी कोढ़ सर्वांगसुन्दर स्वरूपको बिगाड़ देता है, वैसे ही तनिक-सा भी लोभ यशस्वियोंके शुद्ध यश और गुणियोंके प्रशंसनीय गुणोंपर पानी फेर देता है॥ १६॥

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