तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥ २२
labdhvā janmāmaraprārthyaṃ mānuṣyaṃ tad dvijāgryatām|
tadanādṛtya ye svārthaṃ ghnanti yāntyaśubhāṃ gatim|| 22
अर्थ
देवताओंके भी प्रार्थनीय मनुष्य-जन्मको और उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण-शरीर प्राप्त करके जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थका नाश करते हैं, वे अशुभ गतिको प्राप्त होते हैं॥ २२॥
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्र्यताम्।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्॥ २२
देवताओंके भी प्रार्थनीय मनुष्य-जन्मको और उसमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण-शरीर प्राप्त करके जो उसका अनादर करते हैं और अपने सच्चे स्वार्थ-परमार्थका नाश करते हैं, वे अशुभ गतिको प्राप्त होते हैं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.23.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 857) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/11/23/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)