श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम्।

पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन॥ ३४

kecittriveṇuṃ jagṛhureke pātraṃ kamaṇḍalum|

pīṭhaṃ caike'kṣasūtraṃ ca kanthāṃ cīrāṇi kecana|| 34

अर्थ

कोई उसका दण्ड छीन लेता, तो कोई भिक्षापात्र ही झटक ले जाता। कोई कमण्डलु उठा ले जाता तो कोई आसन, रुद्राक्षमाला और कन्था ही लेकर भाग जाता। कोई तो उसकी लँगोटी और वस्त्रको ही इधर-उधर डाल देते॥ ३४॥

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