श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि।

यतवाचं वाचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत्॥ ३६

mūtrayanti ca pāpiṣṭhāḥ ṣṭhīvantyasya ca mūrdhani|

yatavācaṃ vācayanti tāḍayanti na vakti cet|| 36

अर्थ

कोई-कोई वे वस्तुएँ देकर और कोई दिखला-दिखलाकर फिर छीन लेते। जब वह अवधूत मधुकरी माँगकर लाता और बाहर नदी-तटपर भोजन करने बैठता, तो पापी लोग कभी उसके सिरपर मूत देते, तो कभी थूक देते। वे लोग उस मौनी अवधूतको तरह-तरहसे बोलनेके लिये विवश करते और जब वह इसपर भी न बोलता तो उसे पीटते॥ ३५-३६॥

यह अर्थ श्लोक 35–36 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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