श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं

दानादिभिः किं वद तस्य कृत्यम्।

असंयतं यस्य मनो विनश्यद्

दानादिभिश्‍चेदपरं किमेभिः॥ ४७

samāhitaṃ yasya manaḥ praśāntaṃ

dānādibhiḥ kiṃ vada tasya kṛtyam|

asaṃyataṃ yasya mano vinaśyad

dānādibhiścedaparaṃ kimebhiḥ|| 47

अर्थ

जिसका मन शान्त और समाहित है, उसे दान आदि समस्त सत्कर्मोंका फल प्राप्त हो चुका है। अब उनसे कुछ लेना बाकी नहीं है। और जिसका मन चंचल है अथवा आलस्यसे अभिभूत हो रहा है, उसको इन दानादि शुभकर्मोंसे अबतक कोई लाभ नहीं हुआ॥ ४७॥

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