॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.23.51
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत्
किमात्मनश्चात्र ह भौमयोस्तत्।
जिह्वां क्वचित् संदशति स्वदद्भि-
स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत्॥ ५१
janastu hetuḥ sukhaduḥkhayoścet
kimātmanaścātra ha bhaumayostat|
jihvāṃ kvacit saṃdaśati svadadbhi-
stadvedanāyāṃ katamāya kupyet|| 51
अर्थ
यदि मान लें कि मनुष्य ही सुख-दुःखका कारण है, तो भी उनसे आत्माका क्या सम्बन्ध? क्योंकि सुख-दुःख पहुँचानेवाला भी मिट्टीका शरीर है और भोगनेवाला भी। कभी भोजन आदिके समय यदि अपने दाँतोंसे ही अपनी जीभ कट जाय और उससे पीड़ा होने लगे, तो मनुष्य किसपर क्रोध करेगा?॥ ५१॥