श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.62

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः।

धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥ ६२

ya etāṃ bhikṣuṇā gītāṃ brahmaniṣṭhāṃ samāhitaḥ|

dhārayañchrāvayañchṛṇvan dvandvairnaivābhibhūyate|| 62

अर्थ

यह भिक्षुकका गीत क्या है, मूर्तिमान् ब्रह्मज्ञान-निष्ठा ही है। जो पुरुष एकाग्रचित्तसे इसे सुनता, सुनाता और धारण करता है वह कभी सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंके वशमें नहीं होता। उनके बीचमें भी वह सिंहके समान दहाड़ता रहता है॥ ६२॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः

॥ २३॥

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