श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.23.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ज्ञातयोऽतिथयस्तस्य वाङ्मात्रेणापि नार्चिताः।

शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चितः॥ ७

jñātayo'tithayastasya vāṅmātreṇāpi nārcitāḥ|

śūnyāvasatha ātmāpi kāle kāmairanarcitaḥ|| 7

अर्थ

उसने अपने जाति-बन्धु और अतिथियोंको कभी मीठी बातसे भी प्रसन्‍न नहीं किया, खिलाने-पिलानेकी तो बात ही क्या है। वह धर्म-कर्मसे रीते घरमें रहता और स्वयं भी अपनी धन-सम्पत्तिके द्वारा समयपर अपने शरीरको भी सुखी नहीं करता था॥ ७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें