उद्धवजी! जो इस प्रकार विवेकदृष्टिसे देखता है उसके चित्तमें यह प्रपंचका भ्रम हो ही नहीं सकता। यदि कदाचित् उसकी स्फूर्ति हो भी जाय तो वह अधिक कालतक हृदयमें ठहर कैसे सकता है? क्या सूर्योदय होनेपर भी आकाशमें अन्धकार ठहर सकता है॥ २८॥
एवमन्वीक्षमाणस्य कथं वैकल्पिको भ्रमः।
मनसो हृदि तिष्ठेत व्योम्नीवार्कोदये तमः॥ २८
उद्धवजी! जो इस प्रकार विवेकदृष्टिसे देखता है उसके चित्तमें यह प्रपंचका भ्रम हो ही नहीं सकता। यदि कदाचित् उसकी स्फूर्ति हो भी जाय तो वह अधिक कालतक हृदयमें ठहर कैसे सकता है? क्या सूर्योदय होनेपर भी आकाशमें अन्धकार ठहर सकता है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.24.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 866) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/24/28/