श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.24.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम्।

वाङ्मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत्॥ ३

tanmāyāphalarūpeṇa kevalaṃ nirvikalpitam|

vāṅmano'gocaraṃ satyaṃ dvidhā samabhavad bṛhat|| 3

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि ब्रह्ममें किसी प्रकारका विकल्प नहीं है, वह केवल—अद्वितीय सत्य है; मन और वाणीकी उसमें गति नहीं है। वह ब्रह्म ही माया और उसमें प्रतिबिम्बित जीवके रूपमें—दृश्य और द्रष्टाके रूपमें—दो भागोंमें विभक्त-सा हो गया॥ ३॥

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